Aakhir Kab Tak ...!

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Ajay Singh


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जी हाँ, ये पूरी आजादी है… JAGRAN JUNCTION FORUM

Posted On: 15 Aug, 2012  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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इतनी हाय तौबा क्यों…JAGRAN JUNCTION FORUM

Posted On: 8 Aug, 2012  
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Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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पहले आप…पहले आप .ज्वलन्त प्रश्न

Posted On: 22 Aug, 2011  
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Aakhir kab Tak…!

Posted On: 22 Aug, 2011  
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Hello world!

Posted On: 21 Aug, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

दिनेश जी, मैने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि निशा जी के लेख (जिसमे स्व राजीव दीक्षित जी के विचारों का उल्लेख है) को पढ़ने के बाद ही ये लेख लिखा है। अपनी टिप्पणी के अन्तिम अनुच्छेद में मैने ये भी लिखा है की उस समझौते के शाब्दिक अर्थ के आधार पर ही अपनी आजादी पर प्रश्न चिन्ह लगाना क्या सही है? " पुनः वही प्रश्न दोहराना पड़ रहा है कि क्या हम वो सब कुछ करने के लिये आजाद नहीं हैं जो अन्य देश (जिन्हे आप पूर्ण आजाद मानते हों) कर सकते हैं?" आधी,पौनी या ढेढ़ी जितनी भी मात्रा में आप इस आजादी को देख रहे हैं देखिये किन्तु  बस इतनी बात बताइये कि आप क्या करना चाहते हैं और आजादी की कमी के कारण नहीं कर पा रहे हैं?

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

आदर्णीय निशा जी एवं दिनेश जी, सादर प्रणाम,    वास्तव में मैने ये विचार निशा जी के लेख पर टिप्पणी लिखते हुये ही की थी, किन्तु थोड़ा बड़ा हो जाने पर  इसे ब्लाग पर रखना उचित समझा। मैने यह कहने का प्रयत्न किया है कि जिसने सौ वर्षों तक हमारी मान, मर्यादा व गौरव को पद दलित किया वो कुछ न कुछ तो अपनी वाली करते ही। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या आप लोगों को सच में यह लगता है कि अभी भी ब्रिटेन का नियंत्रण हम पर है? क्या व्यवहारिक रूप से अभी भी हम अपने बारे में कोई निर्णय नहीं ले सकते हैं?क्या आजादी के इन वर्षों में कोई ऐसी घटना घटी है जिसमें ब्रिटेन ने हमारे प्रभुता पर अंकुश लगाया हो या लगाने का प्रयास भी किया हो या मात्र चेतावनी तक  दिया हो?  अपनी आजादी को मिले अब इतना समय तो हो ही गया है कि ऐसी आशंकायें स्वतः  समाप्त हो जायें।       आजादी या सत्ता हस्तांतरण के पत्र या संधि पत्र के शाब्दिक अर्थ जो भी हों किन्तु यह आज के समय में हमारा देश प्रभुत्व सम्पन्न है देश है। पुनः वही प्रश्न दोहराना पड़ रहा है कि क्या हम वो सब कुछ करने के लिये आजाद नहीं हैं जो अन्य देश (जिन्हे आप पूर्ण आजाद मानते हों) कर सकते हैं? समस्या बस इतनी है कि ये आजादी हमसे सम्हाली नहीं जा पा रही है।

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

अजय जी, सादर नमस्कार। मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हूँ। 15 अगस्त 1947 को काँग्रेस और अंग्रेजों के मध्य सत्ता के हस्तान्तरण का समझौता हुथा था। अंग्रेजों ने यह समझौता अपनी शर्तों पर किया था। काँग्रेसी नेताओं का सत्ता सुख भोगने की  जल्दी थी। अतः आनन फानन में समझौता कर लिया गया। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि दुनियाँ में यह संदेश जाये कि भारतीयों ने अंग्रेजों से अपनी आजादी छीनी है। अतः उन्होंने काँग्रेस के हाथों में भारत की  सत्ता सौपी। क्योंकि वे अंग्रेजों की शर्त मानने का राजी थे। इलहावाद के अलफ्रेड पार्क में शहीद चन्द्रशेखर आजाद को घेरने वाले कोतवाल को उत्तर प्रदेश के पुलिस  कमान सौपना उन्ही शर्तों में से एक शर्त थी। इस संबंध में आप स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी के आलेख पाढ़िये या उनके भाषण सुनिये। मेरा मानना है कि यह आधी अधूरी आजादी थी, यदि सच कहा जाये तो काँग्रेस और अंग्रेजों के मध्य सत्ता हस्तान्तरण का एक समझौता था। फिर भी आधी अधूरी आजादी की मुबारकबाद......

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

श्रीमान जी,    आपकी बात सच है कि जन साधारण में कुछ संदेह तो उत्पन्न हुआ ही। इसका कारण मैने अपनी सोंच   लिखा भी है। वह कारण है बिना पर्याप्त भूमिका बनाये ये घोषणा कुछ जल्दबाजी में हो गयी वह भी  जब पूर्व में राजनीति से दूर रहने की बात कही जाती रही है।फिर भी यह सही निर्णय ही है।लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गये लोगों से बनी सरकार पर एक सीमा के बाद बनाया गया दबाव उचित से अनुचित के क्षेत्र मे दिखाई देने लगता है।     रही बात सत्ता सुख के लालच की तो यह कहा ही जा चुका है की  " ये कोई पूर्व निर्धारित पैंतरेबाजी नहीं है क्योंकि केजरीवाल जी ने स्पष्ट कहा है कि अभी भी लगभग  दो साल का समय है,यदि सरकार तीनों कानून पास कर देती है तो वह चुनाव में नहीं उतरेंगे। जिन लोगो को उनकी आलोचना ही करनी है भला उनको ये बातें क्यों सुनाई देंगी।"

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

रक्ताले जी,नमस्कार, जी हां ,जनता का मत ले कर ही गये हैं ,भले ही जोड़ तोड़ कर जो सरकारें बन रही हैं वो जनादेश का मज़ाक उड़ाती हों। अन्ना टीम को कितनी सीटें मिलेंगी यह उनके संगठन क्षमता पर निर्भर है। सत्ता मिलने के बाद की चिन्ता तो स्वभाविक है,लेकिन जिन्हे हम देख चुके हैं उनसे अच्छा ये है कि इन नये लोगों पर ही विश्वास किया जाये। जेपी आन्दोलन और अन्ना आन्दोलन में बहुत बड़ा अन्तर है। जेपी जी के आन्दोलन को सत्तालोलुप विपक्षी पार्टियों का समर्थन था जिससे वह आन्दोलन मात्र  सत्ता परिवर्तन तक सफल रहा। अन्ना टीम नयी टीम होगी और इसमे गन्दगी आते आते आयेगी। अन्ना जी को न तो हिन्दू न ही मुसलमान वोट देगा उन्हे भारतीय ही वोट देगा।  जब बात एक हद से आगे बढ़ जाती है हम हिन्दू मुसलमान नहीं रहते।आज के समय से  एक हिन्दू मोदी पर विश्वास कर सकता है पर भाजपा पर नहीं।     जो भी हो देखना है की अन्ना टीम संगठन कैसा तैयार करती है।अगर संगठन ठीक ठाक  बन गया तो उन्हे समर्थन देने मे झिझक नहीं करनी होगी।

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

आदरणीय सादर, जों लोग पहले गए हैं वो भी जनता का विशवास मत हासिल कर के ही गए हैं. अधुरे आंदोलन ने जनता का विश्वास खो दिया है. अन्ना टीम को दो चार सीटें मिल जाए तो गनीमत होगी. किन्तु यदि वाकई ये जनमत को अपनी ओर मोड़ने में कामयाब रहे तो चिंता अधिक होगी क्या ये वाकई पूरी गन्दगी को साफ़ करने में कामयाब हो सकेंगे? जीत के पहले का चरित्र और बाद का दोनों के लिए जेपी के जनता पार्टी के सदस्य उदाहरण हैं. अन्ना के पिछले आंदोलन के वक्त से ही अम्बिका सोनी ने इसके संकेत दे दिए थे. इसलिए इस बार एक दिन भी बंगाली बाबू किसी भी चेनल पर दिखाई नहीं दिए. आपकी बातों से सहमति हैं किन्तु क्या अन्ना जी बीजेपी के हिंदू वोट लेकर कांग्रेस को ही लाभ तो नहीं पहुंचा रहे हैं?  

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

संतोष जी प्रणाम, किसके महात्वाकांक्षा की बात है! अन्ना व अरविन्द जी की कोई राजनैतिक महात्वाकांक्षा नहीं है। 2 साल में भी अगर मांगे मान ली जाती हैं तो वो चुनाव नहीं लड़ेंगे।महापुरुष भी पुरुष ही होते हैं। उनसे भी त्रुटियां होती हैं या होती प्रतीत होती हैं। महत्वपूर्ण है कि उनकी नियति । हमारा देश कुछ गलत निर्णयों के कारण सच में कुछ दुष्परिणाम झेल रहा है किन्तु इसकी स्थिती उतनी बुरी भी नहीं है।भारत और पाकिस्तान एक साथ स्वतंत्र हुए थे , दोनों की स्थिती में अन्तर स्पष्ट है। अतः निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है। (और हां हमारा लेखक अपने का भले ही मूरख कह ले पर हमे पता है हमारा कालीदास कितना   मूरख है या विद्वान हा हा हा.....)

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

आदरणीय अजय जी ,..सादर नमस्कार आपकी हर बात से पूरी सहमती है ,..देश की सेवा करने का अवसर बार बार नहीं आता है ,. यह प्रश्न भी नहीं है की नया दल नहीं बनाना चाहिए ,.जरूर बनाना चाहिए लेकिन यदि अवसरवादिता और महत्वाकांक्षा पहले से बेकाबू हो तो भ्रम बढ़ता है ,....आपने लेखकों से भी प्रश्न किया है तो बताना जिम्मेदारी है कि मूरख लेखक आम आदमी है ,..जो देखता और समझता है वही लिखता है ,..अन्नाजी ,अरविन्द जी ,किरण जी हमारे लिए ही प्रण प्राण से लगे हैं ,...हम उनका सत्कार करने लायक भी नहीं हैं ,.हम सदा अपने नायकों के रिणी रहेंगे .. आपने गांधीजी के साथ भी गलत लोगों के होने की बात कही है तो उसका दुष्परिणाम ही आज की स्थिति है ,..क्या हम दलदली भविष्य के लिए एक कच्ची लड़ाई लडेंगे ,..स्वामी रामदेव जी और अन्नाजी हमारे महापुरुष हैं ,..दोनों जरूर कोई रास्ता निकालेंगे ,..अन्नाजी ने टीम खत्म कर और भारत स्वाभिमान आन्दोलन को पूरा समर्थन देकर बदलाव की राह मजबूत की है ,..आशा और प्रार्थना है कि देश शीघ्र उजाले की तरफ चले ,..सादर आभार सहित

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

पीताम्बर जी नमस्कार,    आखिर राजनीति के मुद्दे पर असहमति क्यों? ये सच है कि अपनी चुनाव प्रणाली भी अपरिपक्व है किन्तु लोकतंत्र में एक सीमा के बाद हम जनता द्वारा चुनी गयी सरकार पर और अधिक दबाव नहीं बना सकते।यदि उचित राजनैतिक विकल्प नहीं रहेगा तो हम किसे संसद में भेज कर अपनी आशा  जीवित रखें। राजनीति की डगर कठिन है बस इतनी सी बात पर हम डर जायें?    जब सभी वर्तमान राजनैतिक गैंग की लूट-खसोट पर संधि हो चुकी है तो उनसे अनशन व सत्याग्रह से बात नहीं बन सकती है,और ऐसे में यदि राजनैतिक विकल्प भी नहीं होगा तो एक ही रास्ता बचता है वो है सशस्त्र क्रांति।

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh




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